Thursday, 17 April 2014

वेद- पुराण उचारत हावय

सरग   ल   टमरत   ठाढे   हावय  देवदारु  कोटवार   हर 
बादर सँग हॉसत-गोठियावत हे   देवदारु कोटवार  हर ।

महर-महर मम्हावत हावै चिक्कन-चिक्कन पान वोकर 
राग  -  भैरवी   गावत   हावय   देवदारु   कोटवार   हर ।

रूप अऊ गुन म निच्चट वोहर देवता मन कस लागत हे 
सबके  सुख - दुख  पूछत  हावै  देवदारु  कोटवार   हर ।

भरे  हे ओखद के  जम्मो  गुन  देवदारु के  रुख  म  सुन
प्रान  ल  सञ्जीवनी   देवत  हे  देवदारु  कोटवार   हर ।

'शकुन' गरीयस  कस  लागत  हे  चँवर डोलावत ठाढे हे
वेद  -  पुरान  उचारत   हावय    देवदारु कोटवार  हर ।

3 comments:

  1. हांलाकि लोकभाषा का बंधन है लेकिन फिर भी जितना आत्‍मसात कर पाया हूं, उससे आनंदित हूं।

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  2. ज्यादा अर्थ तो समझ नही आया
    परन्तु पढकर अच्छा लगा.

    आभार

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  3. बहुत ही सुंदर रचना !

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